अस्पतालों में मरीजों से वसूली जा रही मोटी रकम, दवाओं पर 700% और मेडिकल सामान पर 1,000% तक मार्जिन! जानिए कैसे

अस्पतालों में इलाज कराना लगातार महंगा होता जा रहा है। मरीजों को दवाओं और मेडिकल सामान के लिए भारी रकम चुकानी पड़ती है। अब केंद्र सरकार ने भी इस समस्या को स्वीकार किया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि कुछ दवाओं पर 700% से ज्यादा मार्जिन लिया जा रहा है। मेडिकल सामान पर यह मार्जिन एक हजार प्रतिशत या उससे अधिक भी हो सकता है।

अस्पतालों में मरीजों से वसूली जा रही मोटी रकम, दवाओं पर 700% और मेडिकल सामान पर 1,000% तक मार्जिन! जानिए कैसे

अस्पताल कई बार सस्ते में दवाएं खरीदकर मरीजों को पूरी कीमत पर बेचते हैं। मरीजों को उनकी असली खरीद कीमत का पता भी नहीं चलता। सरकार ने इस तरीके को गलत बताया है। अब इस समस्या को रोकने के उपायों पर विचार किया जा रहा है।

दवाओं पर 700% मार्जिन कैसे मिलता है?

अस्पताल दवा कंपनियों से बड़ी मात्रा में दवाएं खरीदते हैं। कई बार कंपनियां उन्हें कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराती हैं। इसके बाद अस्पताल मरीजों को वही दवाएं अधिकतम खुदरा मूल्य पर बेचते हैं। इसे मैक्सिमम रिटेल प्राइस यानी MRP कहा जाता है। सरकारी हलफनामे के मुताबिक, कुछ दवाओं पर मार्जिन 170% से 700% तक होता है। कुछ मामलों में यह इससे भी ज्यादा हो सकता है। कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं में भी ज्यादा मार्जिन की बात सामने आई है। हालांकि एमआरपी पर दवा बेचना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। सरकार की चिंता अस्पतालों के ज्यादा मुनाफे और मरीजों की मजबूरी को लेकर है। 

अस्पतालों में केवल दवाएं ही महंगी नहीं मिलतीं। इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाले मेडिकल सामान पर भी भारी मार्जिन होता है। सरकार के मुताबिक, कुछ मेडिकल सामग्री पर सौ प्रतिशत से एक हजार प्रतिशत तक मार्जिन हो सकता है। कुछ मामलों में यह इससे भी ज्यादा हो सकता है। अस्पताल कई बार मेडिकल सामान का बिल अलग से बनाते हैं। मरीजों को सामान की खरीद कीमत की जानकारी नहीं मिलती। इससे मरीज यह समझ नहीं पाते कि अस्पताल ने सामान कितने में खरीदा था। उनसे कितनी अतिरिक्त रकम ली जा रही है। इसी वजह से इलाज का कुल खर्च काफी बढ़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने क्या बताया?

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट  को एक हलफनामा दाखिल किया है। इसमें अस्पतालों की दवाओं और मेडिकल सामान की कीमतों पर चिंता जताई गई है। सरकार ने माना कि कुछ अस्पताल ज्यादा मुनाफे वाली दवाओं को प्राथमिकता देते हैं। दवा कंपनियां इन अस्पतालों को अच्छा ट्रेड मार्जिन देती हैं। इसके बाद वही दवाएं मरीजों को मैक्सिमम रिटेल प्राइस (MRP) पर बेची जाती हैं। सरकार ने इसे गलत कारोबारी तरीका बताया है। इस समस्या को दूर करने के लिए संबंधित पक्षों से बातचीत की जा रही है।

अस्पतालों के बिल पर नियंत्रण क्यों मुश्किल?

सरकार के सामने अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था को नियंत्रित करना बड़ी चुनौती है। स्वास्थ्य सेवाएं मुख्य रूप से राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। अस्पतालों पर क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट या राज्यों के दूसरे कानून लागू हो सकते हैं। केंद्र सरकार की भूमिका मुख्य रूप से दवाओं की कीमतें नियंत्रित करने से जुड़ी है। एक परेशानी मेडिकल बिलिंग की व्यवस्था भी है।

कई अस्पताल पूरे इलाज का एक पैकेज बिल बनाते हैं। इसमें हर मेडिकल सामान की अलग जानकारी नहीं होती। सरकार के पास भी सभी सामान की खरीद कीमत का पर्याप्त डेटा नहीं है। अधिकारियों को आशंका है कि सामान की कीमत सीमित करने पर दूसरी फीस बढ़ाई जा सकती है।