पत्रकारों के हाथ बांध देगा नया डेटा कानून? सुप्रीम कोर्ट पहुंचे 21 बड़े न्यूज पब्लिशर्स, जानें पूरा विवाद

DPDP Act 2023 के खिलाफ 21 न्यूज पब्लिशर्स ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. जानें क्यों पत्रकारिता, गुप्त सूत्रों और प्रेस की आजादी को लेकर उठ रहे सवाल.

पत्रकारों के हाथ बांध देगा नया डेटा कानून? सुप्रीम कोर्ट पहुंचे 21 बड़े न्यूज पब्लिशर्स, जानें पूरा विवाद
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देश में प्रेस की स्वतंत्रता और खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) के भविष्य को लेकर एक बड़ी कानूनी और वैचारिक जंग छिड़ गई है. देश के 21 सबसे बड़े और प्रतिष्ठित न्यूज़ पब्लिशर्स के एक ग्रुप ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है. इनका कहना है कि भारत का नया डेटा प्रोटेक्शन कानून पत्रकारों के हाथ बांध देगा और इससे भ्रष्टाचार या घोटालों का पर्दाफाश करना लगभग असंभव हो जाएगा. रॉयटर्स द्वारा एक्सेस किए गए कोर्ट के दस्तावेजों के मुताबिक, डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने इस संबंध में एक बेहद अहम याचिका दायर की है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है. इस कानूनी लड़ाई में देश के सबसे बड़े मीडिया घराने आमने-सामने हैं. 

किन दिग्गजों ने उठाई आवाज़?

DNPA द्वारा दायर इस याचिका में देश का मीडिया जगत दो हिस्सों में बंटता नजर आ रहा है. इस एसोसिएशन में वे मीडिया संस्थान शामिल हैं जिनके पीछे देश के सबसे बड़े कारोबारी घराने हैं:

नेटवर्क 18 : उद्योगपति मुकेश अंबानी के ऑनरशिप वाला ग्रुप, जिसके पास 7 प्रमुख डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म हैं

एनडीटीवी (NDTV): उद्योगपति गौतम अडानी के स्वामित्व वाला प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल और डिजिटल वेंचर

अन्य प्रमुख नाम: इसमें 'द इंडियन एक्सप्रेस' और 'टाइम्स इंटरनेट' (देश के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार 'टाइम्स ऑफ इंडिया' का डिजिटल विंग) सहित कई अन्य दिग्गज मीडिया हाउस भी शामिल हैं

कानून से क्या है मुख्य आपत्ति? (DNPA के मुख्य तर्क)

लगभग 698 पन्नों की इस विस्तृत याचिका में DNPA ने सरकार के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 के कई प्रावधानों को चुनौती दी है. पब्लिशर्स की मांग है कि मई 2027 से पूरी तरह लागू होने वाले इन विवादित नियमों को रद्द किया जाए. 

इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म का खात्मा: याचिका में कहा गया है कि यह कानून खोजी पत्रकारिता को एक ऐसा 'बेअसर रिकॉर्डर' बना देगा जो सिर्फ घटनाओं की खानापूर्ति करेगा. अगर किसी पत्रकार को अपनी जांच शुरू करने से पहले आरोपी या विषय से अनुमति (Consent) लेनी पड़े, तो यह "उस व्यक्ति को सबूत मिटाने और गवाहों को डराने-धमकाने का खुला लाइसेंस" देने जैसा होगा. 

कॉन्फिडेंशियल सोर्स (गुप्त सूत्रों) का उजागर होना: नियमों के तहत, केंद्र सरकार या फेडरल अथॉरिटी पर्सनल डेटा संभालने वाले किसी भी संगठन से कभी भी कोई भी जानकारी मांग सकती है. पब्लिशर्स को डर है कि इससे न्यूज़रूम पर दबाव बनेगा और उन्हें अपने गुप्त सूत्रों (Sources) के नाम उजागर करने पड़ सकते हैं. इससे व्हिसलब्लोअर्स (Whistleblowers) का भरोसा टूटेगा और वे भ्रष्टाचार, कॉर्पोरेट गड़बड़ियों या चुनावी घोटालों की जानकारी पत्रकारों के साथ साझा करने से डरेंगे. 

रिपोर्ट्स को डिलीट या एडिट करने का दबाव: इस कानून के तहत आम लोगों को यह अधिकार मिलता है कि वे कभी भी अपनी सहमति वापस ले सकें और अपने डेटा को मिटाने की मांग करें. DNPA का तर्क है कि इससे पब्लिशर्स पर किसी भी पुरानी, सही और जनहित वाली न्यूज़ रिपोर्ट को भी अनपब्लिश करने या उसमें भारी बदलाव करने का कानूनी दबाव बन जाएगा. 

प्रेस की आज़ादी पर 'प्री-सेंसरशिप': कानून के तहत बनने वाली फेडरल अथॉरिटी के पास यह ताकत होगी कि वह नियमों का उल्लंघन होने पर भारी जुर्माना लगा सके और 'आम जनता के हित' का हवाला देकर किसी भी जानकारी तक पहुंच को रोक सके. पब्लिशर्स का कहना है कि यह किसी भी जीवंत और मजबूत लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक 'प्री-सेंसरशिप' जैसा है. 

सरकार से मिला था भरोसा, लेकिन लिखित छूट न होना बड़ी चिंता

DNPA की फाइलिंग के अनुसार, बीते अगस्त महीने में मीडिया कंपनियों की सरकार के साथ एक बैठक हुई थी. उस दौरान उन्हें यह भरोसा दिलाया गया था कि यह नया कानून प्रेस की आज़ादी की रक्षा करेगा. लेकिन पब्लिशर्स का कहना है कि यूरोपीय संघ (EU), सिंगापुर और ब्रिटेन जैसे देशों के कानूनों की तरह भारतीय कानून में पत्रकारों के लिए कोई स्पष्ट और लिखित छूट (Written Exemption) नहीं दी गई है. यही अनिश्चितता और बिना किसी गाइडेंस के अधिकारियों को दी गई असीमित शक्तियां आज मीडिया जगत के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गई हैं.