UP Govt Job Rules 2026: सरकारी नौकरियों के लिए कैरेक्टर वेरिफिकेशन नियम हुए और सख्त, जानिए क्या हैं नए प्रावधान

UP Govt Job Rules 2026: यूपी में सरकारी नौकरी के लिए पुलिस वेरिफिकेशन 30 दिन में होगा. जानें नए नियम, अयोग्यता के आधार और अभ्यर्थियों को मिलने वाले अधिकार.

UP Govt Job Rules 2026: सरकारी नौकरियों के लिए कैरेक्टर वेरिफिकेशन नियम हुए और सख्त, जानिए क्या हैं नए प्रावधान
Image From X Handle

UP Govt Job Rules 2026: उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी पाने का सपना देख रहे युवाओं के लिए राज्य सरकार ने पुलिस वेरिफिकेशन और चयन प्रक्रिया के नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं. इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद, नियुक्ति और कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज ने इस संबंध में एक नया और विस्तृत सरकारी आदेश जारी किया है. इस संशोधित पॉलिसी का मुख्य उद्देश्य सरकारी विभागों, निगमों, परिषदों और स्थानीय निकायों (लोकल बॉडीज) में सीधी भर्ती के तहत चुने जाने वाले उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि की जांच को अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाना है. 

राजनीतिक विचारधारा से असहमति नहीं

नए नियमों में यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी उम्मीदवार को केवल उसकी राजनीतिक आस्था या वैचारिक सोच (Political Ideology) के आधार पर सरकारी नौकरी से अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा. हालांकि, सरकार ने यह भी कड़ाई से स्पष्ट किया है कि यदि कोई उम्मीदवार ऐसे संगठनों या गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल है जिनका उद्देश्य हिंसा के माध्यम से देश या राज्य के मौजूदा सिस्टम (व्यवस्था) को बदलना है, तो उसे सरकारी नौकरी के लिए पूरी तरह अयोग्य माना जाएगा. 

तीन साल का असेसमेंट पीरियड

नियमों के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति ने 21 वर्ष की आयु के बाद और जांच की तारीख से पिछले तीन वर्षों के भीतर ऐसी हिंसक या विध्वंसक गतिविधियों में हिस्सा लिया है, तो इसे उसकी सक्रिय संलिप्तता का प्रमाण माना जाएगा. जब तक कि उसके आचरण और व्यवहार में सुधार का कोई ठोस व अकाट्य सबूत न हो, उसे नियुक्ति नहीं मिलेगी. 

किन गंभीर अपराधों और मामलों में नहीं मिलेगी नौकरी?

बदले गए फ्रेमवर्क के तहत कई गंभीर अपराधों को अयोग्यता की श्रेणी में रखा गया है. अगर कोई उम्मीदवार निम्नलिखित मामलों में संलिप्त पाया जाता है, तो उसका चयन रद्द कर दिया जाएगा:  

  • जघन्य अपराध: हत्या (Murder), डकैती/लूट, बलात्कार और महिलाओं के विरुद्ध अपराध
  • भ्रष्टाचार और आतंकवाद: करप्शन के मामले और टेररिस्ट एक्टिविटीज 
  • परीक्षा और शिक्षा माफिया: परीक्षा पेपर लीक करना, सॉल्वर गैंग से जुड़े मामले, तथा परीक्षाओं में धोखाधड़ी (जैसे डमी कैंडिडेट्स या फर्जी/जाली सर्टिफिकेट का इस्तेमाल करना)
  • साइबर और आधुनिक अपराध: डिजिटल अरेस्ट स्कैम, यूपीआई फ्रॉड (UPI Fraud) जैसे साइबर अपराध

अन्य गंभीर श्रेणियां: मनी लॉन्ड्रिंग, स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ (नारकोटिक्स) अधिनियम, और संगठित अपराध (Organized Crime) से जुड़े कानूनी मामले. राहत की बात यह है कि सरकार ने स्पष्ट किया है कि सिर्फ एफआईआर दर्ज होने या जांच पेंडिंग होने मात्र से किसी उम्मीदवार को स्वतः अयोग्य नहीं माना जाएगा. इसके अलावा, आपसी समझौते से सुलझ चुके मामले और किशोर न्याय (जुवेनाइल जस्टिस) कानूनों के अंतर्गत आने वाले केस भी अयोग्यता का आधार नहीं बनेंगे. 

पुलिस वेरिफिकेशन के लिए सख्त टाइमलाइन (30 दिन की समयसीमा)

अक्सर पुलिस सत्यापन में होने वाली लंबी देरी से उम्मीदवारों को परेशानी का सामना करना पड़ता था. इस समस्या के समाधान के लिए नई गाइडलाइन में तय समयसीमा निर्धारित की गई है. जिला पुलिस और स्थानीय खुफिया इकाई (LIU) को वेरिफिकेशन की रिक्वेस्ट मिलने के 30 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट संबंधित प्राधिकारी को सौंपनी होगी. अगर इस डेडलाइन का पालन नहीं किया गया, तो गृह विभाग इस पूरी प्रक्रिया की मॉनिटरिंग करेगा. पुलिस और एलआईयू कर्मचारियों को वेरिफिकेशन के नाम पर उम्मीदवार के घर के चक्कर काटने या उनकी अनावश्यक शारीरिक मौजूदगी (Physical Presence) पर जोर देने की आवश्यकता नहीं होगी. वहीं अगर किसी उम्मीदवार के संबंध में कोई प्रतिकूल (नेगेटिव) रिपोर्ट मिलती है, तो जिला मजिस्ट्रेट को अंतिम सिफारिश भेजने से पहले उम्मीदवार को ऑनलाइन या स्वयं उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा. जो कर्मचारी या अधिकारी पहले से ही सरकारी सेवा में हैं, उन्हें नया कैरेक्टर वेरिफिकेशन कराने की जरूरत नहीं होगी, हालांकि उनके पिछले विभागों से जानकारी जरूर मांगी जा सकती है. 

न्यायिक समीक्षा और अदालतों के निर्देश

यह पूरी संशोधित पॉलिसी अदालतों में चल रही कानूनी लड़ाइयों और न्यायिक समीक्षाओं के बाद लाई गई है. हाल ही में (12 अक्टूबर को), इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक चुने हुए पुलिस कांस्टेबल की उम्मीदवारी रद्द किए जाने के फैसले को खारिज कर दिया था. कोर्ट ने यह टिप्पणी की थी कि नियुक्ति प्राधिकारी को केवल नकारात्मक रिपोर्टों पर आँख मूंदकर भरोसा करने के बजाय, मामले के सभी पहलुओं और परिस्थितियों का खुद से स्वतंत्र मूल्यांकन (Independent Assessment) करना चाहिए.